10.3.11

पंजाब केसरी लाला लाजपत राय जी

          लाला लाजपत राय जी बहुमुखी प्रतिभा के dhanee थे ! वह एक लेखक, राजनीतिग्य , उत्कृष्ठ समाजसेवी ,पंजाब नॅशनल बैंक व लक्ष्मी इंश्योरेंस कंपनी के संस्थापक भी थे किन्तु उनकी सर्वाधिक प्रसिधी एक महान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में ही है !  

प्रारंभिक जीवन व समाज-सेवा
लाला जी का जन्म 28-जनवरी-1865 को पंजाब राज्य के मोंगा जिले के दुधिके गाँव में हुआ था ! उनके पिता श्री लाला राधा किशन आजाद जी सरकारी स्कूल में उर्दू के शिक्षक थे जबकि उनकी माता देवी गुलाब देवी धार्मिक महिला थीं !
            लाला जी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थे व धन , आदि की अनेक कठिनाइयों के पश्चात् भी उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की ! 1880 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी व पंजाब यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षाएं पास करने के बाद उन्होंने लाहोर गवर्नमेंट कॉलेज में दाखिला ले लिया व कानून की पढाई प्रारंभ की ! लेकिन घर की माली हालत ठीक न होने के कारन दो वर्ष तक उनकी पढाई बाधित रही !

               लाहोर में बिताया गया समय लाला जी के जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ और यहीं उनके भावी जीवन की रूप-रेखा निर्मित हो गयी !  उन्होंने  भारत के गौरवमय इतिहास का अध्ययन किया और महान भारतीयों के विषय में पढ़कर  उनका हृदय द्रवित हो उठा ! यहीं से उनके मन में राष्ट्र प्रेम व राष्ट्र सेवा की भावना का बीजारोपण हो गया !कानून की पढाई के दौरान वह लाला हंसराज जी व पंडित गुरुदत्त जी जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आये ! यह तीनों अच्छे मित्र बन गए और 1882 में आर्य समाज के सदस्य बन गए !  उस समय आर्य समाज समाज-सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था और यह पंजाब के युवाओं में अत्यधिक  लोकप्रिय था !

                    1885 में उन्होंने लाहोर के गवर्नमेंट कॉलेज से द्वितीय श्रेणी में वकालत की परीक्षा पास की और हिसार में अपनी कानूनी प्रैक्टिस प्रारंभ कर दी ! प्रेक्टिस के साथ-साथ वह आर्य समाज के सक्रीय कार्यकर्ता भी बने रहे ! स्वामी दयानंद जी की म्रत्यु के पश्चात् उन्होंने अंग्लो-वैदिक  कॉलेज हेतु धन एकत्रित करने में सहयोग किया ! आर्य समाज के तीन कक्ष्य थे : समाज सुधार, हिन्दू धर्म की उन्नति और शिक्षा का प्रसार ! वह अधिकांश समय आर्य समाज के सामाजिक कार्यों में ही लगे रहते ! वह सभी सम्प्रदायों की भलाई के प्रयास करते थे और इसी का नतीजा था की वह हिसार म्युनिसिपल्टी हेतु निर्विरोध चुने गए जहाँ की अधिकांश जनसँख्या मुस्लिम थी !

समाज-सेवा और राजनीतिक जीवन

            लाला जी के मन में अब स्वतंत्रता की उत्कट भावना पैदा हो चुकी थी और इसीलिए 1888 में 23 वर्ष की आयु में उन्होंने समाज सेवा के साथ-साथ राजनीती में भी प्रवेश किया और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के सदस्य बन गए !  जब पंजाबी प्रतिनिधिमंडल के साथ उन्होंने इलहाबाद में कांग्रेस अधिवेशन   में भाग लिया तो उनका जोरदार स्वागत हुआ और उनके उर्दू भाषण ने सभी का मन मोह लिया !  अपनी योग्यता के बल पर वह जल्द ही कांग्रेस के लोकप्रिय नेता बन गए !

             लगभग इसी समय जब सर सैयद अहमद खान ने कांग्रेस से अलग होकर मुस्लिम समुदाय से यह कहना शुरू किया की उसे कांग्रेस में जाने की बजाय अंग्रेज सरकार का समर्थन करना चाहिए तब लाला जी ने इसके विरोध में उन्हें "कोहिनूर" नामक उर्दू साप्ताहिक में खुले पत्र लिखे जिन्हें काफी प्रशंसा मिली !

        1892 में पंजाब हाईकोर्ट में वकालत करने हेतु वह हिसार से लाहोर चले गए  ! यहाँ भी लालाजी राष्ट्र सेवा में जुटे रहे !

         उन्होंने लेखन द्वारा भी अपना प्रेरक कार्य जरी रखा और शिवाजी, स्वामी दयानंद, मेजिनी, गैरीबाल्डी जैसे प्रसिद्ध लोगों की आत्मकथाएं अनुवादित व प्रकाशित कीं ! इन्हें पढ़कर अन्य लोगों ने भी स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु संघर्ष की प्रेरणा प्राप्त की !

        लाला जी जन सेवा के कार्यों में तो सदैव ही आगे रहते थे इसीलिए 1896 में जब सेन्ट्रल प्रोविंस में भयानक सूखा पड़ा तब लाला जी ने वहां अविस्मर्णीय सेवाकार्य किया !  जब वहां सैकड़ों निर्धन, अनाथ, असहाय मात्र इसाई मिशनरियों की दया पर निर्भर थे और वह उन्हें सहायता के बदले अपने धर्म में परिवर्तित कर रहीं थीं तब लाला जी ने अनाथों के लिए एक आन्दोलन चलाया व जबलपुर, बिलासपुर,आदि अनेक जिलों के 250 अनाथ बालकों को बचाया और उन्हें पंजाब में आर्य समाज के अनाथालय में  ले आये ! उन्होंने कभी भी धन को सेवा से ज्यादा महत्व नहीं दिया और जब उन्हें प्रतीत हुआ की वकालत के साथ-साथ समाज सेवा के लिए अधिक समय नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने अपनी वकालत की प्रेक्टिस कम कर दी !

      इसी प्रकार 1899 में जब पंजाब, राजस्थान, सेन्ट्रल प्रोविंस, आदि में और भी भयावह अकाल पड़ा और 1905 में कांगड़ा जिले में भूकंप के कारन जन-धन की भारी हानि हुई तब भी लालाजी ने आर्य समाज के कार्यकर्त्ता के रूप में असहायों की तन,मन,धन से सेवा-सहायता की !

          उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन  में महत्वपूर्ण योगदान दिया !  भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में उन्होंने रचनात्मकता, राष्ट्र निर्माण व आत्मनिर्भरता पर जोर दिया ! कांग्रेस में वह बाल गंगाधर तिलक जी व बिपिनचंद्र पाल जी के साथ उग्रवादी विचारधारा से सहमत थे और यह तीनों " लाल-बाल-पाल " नाम से प्रसिद्ध थे ! जहाँ उदारवादी कांग्रेसी अंग्रेज सरकार की  कृपा चाहते थे वहीँ उग्रवादी कांग्रेसी अपना हक़ चाहते थे ! लाला जी मानते थे की स्वतंत्रता भीख और प्रार्थना से नहीं बल्कि संघर्ष और बलिदान से ही मिलेगी ! 

             बंगाल विभाजन के समय उन्होंने भी स्वदेशी, स्वराज और विरोध के राष्ट्रिय आन्दोलन में बढ़-चढ़ के भाग लिया था ! 1906 में जब कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी धडों में विवाद हुआ तब उन्होंने मध्यस्थता करने का बहुत प्रयास किया ! 1907 में जब तिलक जी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद  हेतु उनका नाम प्रस्तावित किया लेकिन विवाद की संभावना देखते हुए लाला जी ने अपना नाम आगे नहीं बढ़ने दिया !

             लाला जी मानते थे की राष्ट्रिय हित के लिए विदेशों में भी भारत के समर्थन में प्रचार करने हेतु एक संगठन की जरूरत है ताकि पूरी दुनिया के सामने भारत का पक्ष रखा जा सके और अंग्रेज सरकार का अन्याय उजागर किया जा सके ! इसीलिए 1914 में वह ब्रिटेन यात्रा पर गए ! यहाँ से वह अमेरिका गए जहाँ उन्होंने " इन्डियन होम लीग सोसायटी ऑफ़ अमेरिका " की स्थापना की और " यंग इण्डिया " नामक पुस्तक लिखी ! इसमें अंग्रेज सरकार का कच्चा चिटठा खोला गया था इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रकाशित होने से पूर्व ही इंग्लॅण्ड और
 भारत में प्रतिबंधित कर दिया !  प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् वह भारत वापस आ गए !

            उन्होंने पंजाब में जलियांवाला नरसंहार के विरोध में असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व किया ! उन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा लेकिन वह पीछे नहीं हटे ! जब चौरी-चौरा घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन स्थगित किया तब लाला जी इससे बहुत निराश हुए !   1925 में वह केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य भी चुने गए !


म्रत्यु
           1928 में सात सदस्यीय सायमन कमीशन भारत आया जिसके अध्यक्ष सायमन थे ! इस कमीशन को अंग्रेज सरकार ने भारत में संवेधानिक सुधारों हेतु सुझाव देने के लिए नियुक्त किया था जबकि इसमें एक भी भारतीय नहीं था ! इस अन्याय पर भारत में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस ने पूरे देश में सायमन कमीशन के शांतिपूर्ण विरोध का निश्चय किया !
    इसीलिए जब 30-अक्टूबर-1928 को सायमन कमीशन लाहोर पहुंचा तब वहां उसके विरोध में लाला जी ने मदन मोहन मालवीय जी के साथ शांतिपूर्ण जुलूस निकाला ! इसमें भगत सिंह जैसे युवा स्वतंत्रता सेनानी भी शामिल थे ! पुलिस ने इस अहिंसक जुलूस पर लाठी चार्ज किया ! इसी लाठीचार्ज में लालाजी को निशाना बनाकर उन पर जानलेवा हमला किया गया जिस से उन्हें घातक आघात लगा और अंतत: 17-नवम्बर-1928 को यह सिंह चिर-निद्रा में सो गया ! अपनी म्रत्यु से पूर्व लाला जी ने भविश्यवाणी की थी की " मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी अंग्रेज सरकार के ताबूत में अंतिम कील साबित होगी ! " , जो की सच साबित हुई !

           लाला जी की इस हत्या ने भगत सिंह, आदि क्रांतिकारियों को उद्वेलित कर दिया ! अभी तक वह गाँधी जी के अहिंसक आन्दोलन में जी-जान से जुड़े थे किन्तु जब उन्होंने देखा की शांतिपूर्ण विरोध पर भी दुष्ट अंग्रेज सरकार लाला जी जैसे व्यक्ति की हत्या कर सकती है तो उन्होंने इस अन्याय  व अत्याचार का बदला लेने की ठान ली और लाला जी के हत्यारे अंग्रेज अधिकारी सौन्ड़ेर्स को मारकर ही दम लिया !

      लाला जी की माँ श्रीमती गुलाब देवी की म्रत्यु  टी.बी. के कारण हुई थी इसीलिए लाला जी ने 1927 में उनकी स्मृति में एक ट्रस्ट की स्थापना की जिसका उद्देश्य था महिलाओं के लिए टी.बी.  होस्पीटल की स्थापना करना !  इस  का निर्माण 1934 में पूरा हो गया और महात्मा गाँधी ने इसका उद्घाटन किया किन्तु दुर्भाग्यवश लाला जी इस सुअवसर पर जीवित न थे !

प्रेरणायादगार
  • 1895 में लाला जी के सहयोग से "पंजाब नॅशनल बैंक" व लक्ष्मी इंश्योरेंस कंपनी की स्थापना हुई !    
  •    उन्होंने राष्ट्रिय भावना के प्रचार हेतु उर्दू में "वंदे मातरम" और अंग्रेजी में "द पीपल" नामक साप्ताहिक समाचारपत्र निकाले !
  •    उन्होंने अनाथ बालकों के लिए अनेक अनाथालयों की स्थापना की !
  • उनके सहयोग से ही " ऑल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस" नामक श्रमिक संघ की स्थापना हुई और वह उसके प्रथम अध्यक्ष भी बने !
 उनकी जन्मशती के अवसर पर पंजाबी समाज के व्यक्तियों द्वारा शिक्षा के प्रसार हेतु " लाला लाजपत राय ट्रस्ट " की स्थापना की गयी !
उनके नाम पर अनेक स्थानों, होस्पीटलों, संस्थानों, स्कूलों, आदि का नाम रखा गया है !
       लाला जी सच्चे अर्थों में राष्ट्र प्रेमी थे ! वह केवल "पंजाब के सिंह" ही नहीं बल्कि पूरे भारत के सिंह थे जिनका जीवन हर भारतीय के लिए प्रेरणा का अविरल स्त्रोत है !

1.3.11

महर्षि दयानंद सरस्वती

                                   महर्षि दयानंद सरस्वती भारत के प्रमुख विद्वान,सन्यासी ,समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक हैं ! सर्वप्रथम उन्होंने ही स्वराज का नारा दिया था जिसे बाद में श्री लोकमान्य तिलक ने अपनाया ! उन्होंने तत्कालीन समाज में प्रत्येक धर्म में व्याप्त  अंधविश्वासों का विरोध  किया और सनातन वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना की ! इसी क्रम में उन्होंने "वेदों की और लौटो " का साश्वत नारा दिया ! पूर्व राष्ट्रपति श्री राधाकृष्णन के अनुसार वह आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक थे !

                                                         ऐसे महान व्यक्तित्व से अनेक महापुरुषों ने प्रेरणा प्राप्त की जिनमें विनायक दामोदर सावरकर ,दुष्ट कर्जन वायली को मारने वाले वीर मदन लाल धींगरा, शहीदे आजम भगत सिंह ,लाला  हरदयाल , स्वामी श्रधानंद , मेडम भीकाजी कामा  ,आदि प्रमुख हैं ! उन्हीं के प्रमुख शिष्य श्री श्याम जी कृष्ण वर्मा ने लन्दन में "इण्डिया हाउस " की स्थापना की थी जो की वहां के युवा क्रांतिकारियों की प्रमुख शरण स्थली थी ! उनकी राशन "सत्यार्थ प्रकाश " ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पथ प्रदर्शन किया !
                          श्री दयानंद जी कर्म , सिद्धांत में संशयवाद तथा ब्रह्मचारी में विश्वास करने वाले सन्यासी थे ! वह सदेव स्त्रियों को पुरुषों के बराबर स्थान देते थे ! उन्होंने सदेव स्त्री शिक्षा और स्त्रियों द्वारा धार्मिक ग्रंथों के पाठ को प्रोत्साहन दिया ! उन्होंने वेदों का संस्कृत भाषा से हिंदी में अनुवाद किया ताकि साधारण  जन -मानस  भी  वेदों को पढ़ और समझ  सके  !

प्रारंभिक जीवन
                  स्वामीजी का जन्म श्री करशंजी लालजी व देवी माँ यशोदाबाई की संतान के रूप में  27-फ़रवरी-1824 को काठियावाड़ (गुजरात) के गाँव टंकारा में हुआ था ! उनका परिवार समृद्ध व धर्मनिष्ठ ब्रह्मण परिवार था ! मूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण उनका नाम "मूलशंकर" रखा गया ! बचपन में ही उन्होंने संस्कृत , वेद व अन्य धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन प्रारंभ कर दिया था !
                   बचपन में ही घटित कुछ घटनाओं ने उनके मन में परम्परागत हिन्दू धर्म व इश्वर के विषय में प्रश्न उत्पन्न कर दिए थे जिनके उत्तरों की खोज में अंतत: वह सन्यासी बन गए  ! 
                एक बार शिवरात्रि के अवसर पर वह परिवार सहित शिवपूजन हेतु मंदिर गए ! रात्रि में उनका परिवार सो गया  किन्तु बालक मूलशंकर जग रहे थे ! उन्होंने देखा की एक चूहा शिव जी की प्रतिमा के पास घूम रहा है और उनके भोग को खा रहा है !यह देखकर उन्हें अत्यधिक आश्चर्य हुआ और उन्होंने सोचा की जो इश्वर अपने भोग की रक्षा नहीं कर सकता वह इश्वर सम्पूर्ण मानव जाति की रक्षा कैसे कर सकता है ? और तभी उन्होंने अपने पिता से कहा की वह ऐसे असहाय  इश्वर की आराधना नहीं कर सकते ! यहीं से उनके ह्रदय में मूर्तिपूजा के विरुद्ध संशय पैदा हो गया !

              इसी प्रकार हैजे के कारण अल्पायु में ही अपनी छोटी बहन और चाचाजी की म्रत्यु ने उनके ह्रदय को झकझोर कर रख दिया और उनके मन में जीवन-म्रत्यु को लेकर अनेकों प्रश्न खड़े होने लगे ! उन्होंने यह प्रश्न अपने परिजनों से पूछने आरम्भ कर दिया इससे उनके परिजनों का चिंतित होना स्वाभाविक था ! उनके परिवार ने उनका विवाह करना चान्हा किन्तु उन्होंने तो निश्चय कर लिया था की विवाह उनके लिए नहीं है और इसीलिए 1846 को गृह त्याग कर वह घुमंतू सन्यासी बन गए !
   उन्होंने पाणिनि के व्याकरण तथा अन्य संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया और उन्हें विश्वास हुआ की इश्वर की खोज की जा सकती है ! लगभग दो दशकों तक इश्वर की खोज में भटकने के पश्चात् उनकी भेंट मथुरा में स्वामी विरजानंद से हुई और उन्हें स्वामीजी ने अपना गुरु बना लिया !   स्वामी विरजानंद ने उन्हें उनकी सभी पुस्तकों को फेंक देने के लिए कहा ताकि वह अभी तक सीखे हुए अपने सभी ज्ञान को  भुला दें और एक नयी स्लेट की तरह दोबारा वेदों के अध्ययन से अपनी शिक्षा प्रारंभ करें क्योंकि वेद ही सर्वाधिक प्राचीन और मूल ग्रन्थ हैं ! मूलशंकर जी ने स्वामी विरजानंद के सान्निध्य  में ढाई वर्षों तक अध्ययन किया ! शिक्षा पूर्ण होने पर मूलशंकर जी ने विरजानंद जी से उनकी गुरु दक्षिणा लेने का आग्रह किया इस पर महान संत श्री विरजानंद जी ने उनसे कहा की वह यदि गुरु दक्षिणा देना चाहते हैं तो इसके लिए वह पूरे समाज में वेदों का प्रसार करें और समाज का कल्याण करें ! स्वामी दयानंद जी ने अपने गुरु की इस इच्छा को शिरोधार्य किया इसी ध्येय की पूर्ती में अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया ! यहीं से उनका नाम स्वामी दयानंद सरस्वती रखा गया !
  स्वामी दयानंद सरस्वती जी का मिशन
स्वामीजी ने अपने प्राणों की परवाह किये बिना तत्कालीन हिन्दू समाज में सुधार का बीड़ा उठा लिया ! इसके लिए उन्होंने पूरे देश में यात्राएं कीं और प्रजा की आँखों से अंधविश्वासों का पर्दा हटाने के लिए अनेक धार्मिक विद्वानों व  पंडितों को शास्त्रथ हेतु चुनोती दी और अपनी तर्क बुधि व ज्ञान के आधार पर सदेव विजयी रहे ! उनका मानना था की हिन्दू धर्म के भ्रष्ट होने का प्रमुख कारण है की पुजारी वर्ग स्व-महत्व के उद्देश्य से वेदों के मूल सिधांत से भटक गया है ! इस वर्ग ने सामान्य जन को वेदों के अध्ययन की जगह कर्मकांडों में लगा दिया है जैसे गंगा स्नान करना या वर्षगांठ पर पंडितों को भोज देना ! इसे स्वामीजी अन्धविश्वास या स्व-सेवा कहते थे !
                                          अनेक लोगों ने यह गलत धारणा बना रखी है की स्वामीजी कट्टर हिंदूवादी थे व अन्य धर्मों से विद्वेष रखते थे जो की पूर्णत: गलत है ! वास्तव में वह सभी धर्मों में व्याप्त कुरीतियों व अंधविश्वासों के खिलाफ थे यदि ऐसा न होता तो वह हिन्दू धर्म में व्याप्त मूर्ती-पूजा , कर्मकाण्डों , अवतारवाद, तीर्थयात्राएं , पशु-बलि, बहुदेववाद , जातिवाद, बल विवाह, छूआछूत ,आदि का विरोध कभी नहीं करते ! उनके अनुसार मानव सेवा ही सच्चा धर्म है और वैदिक धर्म ही सनातन और सच्चा धर्म है !

वैदिक स्कूलों की स्थापना
 समाज में वैदिक धर्म, संस्कृति और मूल्यों की पुन: स्थापना के लिए उन्होंने वैदिक स्कूलों की स्थापना की !ऐसा पहला स्कूल 1869 में फर्रुखाबाद में खोला गया और इसकी सफलता से प्रेरित होकर 1870 में तीन स्थानों - मिर्जापुर , कासगंज  व छलेसर में खोले गए ! 1873 में एक स्कूल वाराणसी में भी खुला ! इसी भावना से उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की !
         इन स्कूलों में छात्र मूर्तिपूजा की जगह संध्या (वेदों के मन्त्रों द्वारा ध्यान व प्रार्थना करना ) करते , दिन में दो बार अग्निहोत्र यग्य करते और केवल वही ग्रन्थ पढाये जाते जो वेदों को स्वीकार करते थे ! यहाँ ब्राम्हणों के अलावा अन्य जाति के छात्रों को भी संस्कृत की शिक्षा दी जाति थी और सभी छत्रों के खाने, पीने, रहने, कपड़ों और किताबों की स्कूल द्वारा ही की जाति थी !
      इतना सब होने के बाद भी यह स्कूल अधिक नहीं चल सके क्योंकि एक ओर धन का अभाव तो था ही वहीँ  योग्य शिक्षक मिलने भी मुश्किल थे और उचित पुस्तकों का भी अभाव था !

     अपनी यात्राओं के दोरान स्वामीजी ब्रह्म समाज के अनुयायियों के संपर्क में भी आये ! स्वामीजी और ब्रह्म समाज की विचारधारा में काफी समानता भी थी किन्तु प्रमुख अंतर यही था की स्वामीजी सिर्फ वेदों को ही इश्वर की वाणी मानते थे और उनके ऊपर कुछ नहीं मानते थे !

सत्यार्थ प्रकाश
                                             अपने कलकत्ता  प्रवास के बाद स्वामीजी ने समाज सुधार  के अपने तरीके में अनेक परिवर्तन किये जिनमें सबसे प्रमुख था हिंदी में व्याख्यान देना ! इससे पहले वह सदा संस्कृत में  ही संवाद और शास्त्रार्थ करते थे ! इससे  उन्हें विद्वानों व आम लोगों में अत्यधिक  सम्मान  प्राप्त हो चुका था किन्तु अधिसंख्य जनता को अपनी बात समझाना मुश्किल था क्योंकि वह संस्कृत नहीं जानती थी ! इसीलिए स्वामीजी ने आम जनता  की भाषा हिंदी को चुना और अब समाज के निचले तबके को भी वह अपनी बात समझा सके !

                     वाराणसी में स्वामीजी द्वारा हिंदी में दिए गए ऐसे ही कुछ व्याख्यानों को सुनकर वहीँ के एक सरकारी अधिकारी श्री  राज जयकिशन दास ने उन्हें सुझाव दिया  की और भी अधिक लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए क्यों न स्वामीजी  अपने विचारों को एक पुस्तक में प्रकाशित करें जिसे जनता में बनता जा सके ! स्वामीजी को यह सुझाव पसंद आया ! 1874 में जून से सितम्बर के बीच उन्होंने इश्वर, वेद, धर्म, आत्मा, विज्ञान,  दर्शन, शिक्षा , सरकार व भारत और विश्व के संभावित भविष्य पर अपने व्यापक विचार दिए जिन्हें उनके लेखक पंडित भीमसेन शर्मा जी ने लेखनबढ किया ! यही लेखन 1875 में सत्यार्थ प्रकाश नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ !     

आर्य समाज की स्थापना
    मुंबई में अनेक अनुयायीयों के आग्रह पर स्वामीजी ने अंतत:  10-अप्रैल-1875  को आर्य समाज  नामक सुधार आन्दोलन की स्थापना की ! यद्यपि स्वामीजी ऐसा नहीं चाहते थे किन्तु जब मुंबई में  एक    धार्मिक सभा में वह व्याख्यान दे रहे थे तभी एक श्रोता ने उनसे पूंछा की "क्या हमें एक नया समाज बनाना चाहिए ?" इस पर स्वामीजी ने कहा "यदि तुम समाज  कीस्थापना द्वारा समाज का कुछ भला कर सकते हो तो समाज बनाओ ...  " 
     अंतत:  100 अनुयायियों के साथ 10 -अप्रैल-1875  को आर्य समाज  की स्थापना हुई ! सदस्यों ने स्वामीजी से इसका अध्यक्ष अथवा गुरु बनने का आग्रह किया लेकिन उन्होंने कृपापूर्वक मना कर दिया और मात्र उसके साधारण सदस्य  ही बने !

आर्य समाज  के दस सिद्धांत 
   24-जून-1877 को दुसरे प्रमुख आर्य समाज  की स्थापना लाहोर में हुई और यहीं  आर्य समाज के प्रमुख दस सिद्धांत सूचीबद्ध किये गए :
  1.  सभी सत्य ज्ञान और इस ज्ञान द्वारा जो भी जाना गया है उसका प्रथम आधार परमेश्वर है !
  2. इश्वर अस्तित्ववान और  आनन्दमय है ! वह निराकार ,सर्वज्ञ, अजन्मा, असीम, अपरिवर्तनीय,  सबका आधार, सबका स्वामी,  सर्वव्यापी,  अंतर्यामी,  निर्भय, अनश्वर,  अनन्त, पवित्र और सबको बनाने वाला है ! केवल वही उपासना के योग्य है !
  3. वेद सत्य ज्ञान के  पवित्र लेख हैं ! यह आर्यों का प्रथम कर्तव्य है की वह वेदों को पढ़ें, पढाएं, चर्चा करें और सुनें !
  4. हर इंसान को हमेशा सत्य को स्वीकार करने और असत्य को छोड़ देने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए !
  5. हर इंसान को हमेशा धर्म  के अनुसार कर्म करने चाहिए अर्थात सत्य-असत्य पर गहन चिन्तन के बाद !
  6. सम्पूर्ण विश्व का भौतिक, आध्यात्मिक व सामाजिक कल्याण करना ही इस समाज का मूल उद्देश्य है !
  7. सदा धर्म के अनुसार  प्रेम और न्याय से व्यवहार करें !
  8. प्रत्येक को सत्य को प्रोत्साहित व असत्य का नाश करना चाहिए ! 
  9. प्रत्येक को केवल अपने कल्याण के बारे में नहीं सोचना चाहिए बल्कि दूसरों के कल्याण में ही अपना कल्याण समझना चाहिए !
  10. प्रत्येक व्यक्ति को खुद को समाज के लोकोपकारवादी शासन के अधीन समझना चाहिए यद्यपि व्यक्तिगत कल्याण हेतु सभी स्वतंत्र हैं !
                  यद्यपि सिख समाज से आर्य समाज के कुछ मतभेद भी हुए लेकिन फिर भी भगत सिंह (सिख) जी जैसे महँ क्रन्तिकारी आर्य समाज से प्रभावित रहे और उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल जी जैसे प्रमुख आर्य समाजी और क्रन्तिकारी के साथ स्वतंत्रता हेतु संघर्ष भी किया !

संत का देहावसान 
                       स्वामीजी की सहज म्रत्यु नहीं हुई थी अपितु एक नर्तकी ने प्रतिशोध लेने के लिए unki हत्या करायी थी !
                   1883 में जोधपुर के महाराजा के निमंत्रण पर स्वामीजी उनके महल गए क्योंकि महाराजा उनके शिष्य बनने को उत्सुक थे ! एक दिन जब स्वामीजी महाराजा के कक्ष में गए तो वहां उन्होंने एक नर्तकी को पाया ! इस पर स्वामीजी ने उन्हें उस नर्तकी और सभी अनैतिक कामों को छोड़ देने और सच्चे आर्य की तरह धर्म का पालन करने के लिए कहा ! नर्तकी को यह बहुत बुरा लगा और उसने बदला लेने के लिए उनके रसोइये को धन देकर उनके दूध में विष मिलवा दिया ! विष मिला  दूध पीकर स्वामीजी सोने चले गए  किन्तु तीव्र जलन होने के कारन जल्द ही जाग गए ! वह तुरंत समझ गए की उन्हें विष दिया गया है किन्तु तब तक विष उनके पूरे रक्त में घुल चुका था ! स्वामीजी म्रत्युशैय्या पर पड़ गए और अति दुखदाई कष्ट से तड़पने लगे ! अनेक डॉक्टर उन्हें ठीक करने आये  किन्तु उनकी  दशा बिगडती गयी ! उनके पूरे शरीर पर बड़े-बड़े घाव हो गए जिनसे खून बहने लगा ! स्वामीजी की ऐसी दशा देखकर उस रसोइये को भी बहुत पश्चाताप हुआ और उसने स्वामीजी के पास जाकर रोते हुए अपने पाप की क्षमा मांगी ! और स्वामीजी ने आशा के अनुरूप उसे न सिर्फ क्षमा ही किया बल्कि धन देकर उसे तुरंत राज्य से बहार भेज दिया क्योंकि सच पता चल जाने पर महाराजा उसे कठोर दंड देते !
         अंतत: 31-अक्टूबर-1883 को इस परम दिव्य आत्मा ने 59 वर्ष की आयु में देहत्याग किया !

रचनायें
  •   स्वामीजी ने लगभग 60 ग्रंथों की रचना की जिनमें 6 वेदांगों की व्याख्या , अष्टाध्यायी पर अधूरी टीका, संस्कारविधि, भ्रत्निवरण , रत्नमाला, वेदभाश्य, आदि प्रमुख हैं !
  • अपने साहित्य और वैदिक ग्रंथों के प्रकाशन के लिए उन्होंने अजमेर में "परोपकारिणी सभा " की स्थापना की !
  • सत्यार्थ प्रकाश (1875)
  • रिग्वेदादी भाष्य भूमिका !
  • Glorious Thoughts of Swami Dayananda
  • An introduction to the commentary on the Vedas
  • आत्मकथा
  • The philosophy of religion in India

  






27.2.11

   राजीव जी और बाबा रामदेव जी के सभी प्रशंसकों के लिए आज का दिन बहुत महान और शुभ है ! आज रामदेव जी के आह्वाहन पर हजारों ,लाखों लोग delhi में इतनी बड़ी सभा कर रहे हैं की यह भ्रष्ट सरकार सच में हिल जाएगी ! हम सब वहां जाकर अपना योगदान देंगे और जो नहीं जा सकेंगे उनकी शुभ कामनाएं हमें ऊर्जा देंगीं !
     - " भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन अत्यधिक सफल रहे ! शुभकामनाएं !"

18.2.11

वीर मदन लाल धींगरा

               वीर मदन लाल धींगरा भारत के वह महान युवा क्रांतिकारी थे जिन्होंने लन्दन में दुष्ट अंग्रेज अधिकारी कर्जन वायली की हत्या कर दुष्ट अंग्रेज सरकार को उसी के देश में ललकारा था ! इंग्लॅण्ड में फांसी पाने वाले वह प्रथम भारतीय क्रांतिकारी थे !
               1906 में वह उच्च शिक्षा के लिए लन्दन गए जहाँ उनकी भेंट वीर सावरकर से हुई और उनके साथ उन्होंने भी 1857 की क्रांति की वर्षगांठ मनाई ! इस उत्सव के प्रतीक स्वरुप जब मदनलाल एक बैच पहनकर कॉलेज गए तो एक अंग्रेज लड़के ने उसे छीनने का प्रयास किया ! इस पर मदन जी उसके पीछे चाकू लेकर भागे ! इसी तरह जब एक बार लन्दन स्थित "इण्डिया हाउस" नामक हॉस्टल में क्रांतिकारी युवक बम बनाने की ट्रेनिंग ले रहे थे तभी मदन जी ने रसायन के एक अत्यधिक गर्म बर्तन को अपने नंगे हाथों से पकड़ लिया जिससे एक बड़ी दुर्घटना होते-होते बच गयी !

जीवन परिचय ->
   श्री मदन जी का जन्म पंजाब में अमृतसर के एक संपन्न "खत्री" परिवार में 18-फ़रवरी-1883 को हुआ था ! उनके पिता दित्ता मल एक धनी सिविल सर्जन थे ! यह बहुत अचरज की बात है की जहाँ उनका परिवार अंग्रेजों का इतना बड़ा समर्थक था वहीँ मदन जी अंग्रेजों के कट्टर दुश्मन थे ! लाहोर में छात्र जीवन के दोरान ही उनपर लाला लाजपत राय जी के " पगड़ी संभाल जट्टा आन्दोलन " और भगत सिंह के चाचाजी श्री अजीत सिंह का बहुत प्रभाव पड़ा ! अत्याचारी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध होने के कारण ही उन्हें कॉलेज से भी निकल दिया गया और उनपर अवैध राजनीतिक गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगाया ! इस स्थिति में उनके परिवार ने भी उनका साथ नहीं दिया और उन्हें घर से निकल दिया  ! मदन जी ने बहुत संघर्ष किया क्लर्क की नौकरी की , तांगा चलाया और यहाँ तक की फैक्ट्री में मजदूरी तक की परन्तु देशप्रेम नहीं छोड़ा ! फैक्ट्री में उन्होंने एक यूनियन बनाने का प्रयास किया पर यहाँ से भी उन्हें निकल दिया गया ! उन्होंने कुछ समय मुंबई में भी काम किया और फिर अपने बड़े भाई की सलाह मानकर 1906 में लन्दन के यूनिवर्सिटी कॉलेज से मेकनिकल इंजीनियरिंग करने के लिए लन्दन रवाना हुए ! उनके बड़े भाई और इंग्लैंड के कुछ राष्ट्रवादियों ने उनका सहयोग किया !
  
वीर सावरकर से भेंट ->
    जल्दी ही मदन जी की भेंट जानेमाने क्रांतिकारी और राजनीतिक विचारक श्री विनायक दामोदर सावरकर और श्री श्याम जी कृष्ण वर्मा से हुई , जो की मदन जी की  पक्की लगन और  गहरे देशप्रेम से बहुत प्रभावित हुए ! यहीं से मदन जी का एकमात्र लक्ष्य स्वतंत्रता के लिए संग्राम करना बन गया ! सावरकर जी ने उन्हें गुप्त क्रांतिकारी संगठन "अभिनव भारत मंडल " का सदस्य बना लिया और हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी ! वह "इण्डिया हाउस " नामक हॉस्टल के भी सदस्य बन गए जिसकी स्थापना श्याम जी कृष्ण वर्मा ने भारतीयों के लिए की थी लेकिन वास्तव में यह भारतीय छात्रों की राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख अड्डा था !
        जब 11-अगस्त-1908 को भारत में श्री खुदीराम बोस और उसके बाद श्री  कन्हाई दत्त , आदि क्रांतिवीरों को फांसी की सजा दी गयी तब मदन जी अत्यधिक उत्तेजित हो उठे ! उन्होंने वीर सावरकर से पूंछा की क्या अपनी मात्रभूमि के लिए प्राण देने का यह सही वक्त है ? इस पर उन्हें यह प्रसिद्ध उत्तर मिला " अगर तुम सर्वोच्च बलिदान के लिए तैयार हो और तुम्हारे मन ने अंतिम मुक्ति के बारे में सोच लिया है तो निश्चित रूप से अपने राष्ट्र के लिए प्राण देने का यह सही समय है !"
     कर्जन वायली तत्कालीन भारत सचिव  का सहायक सैनिक अधिकारी (aide-de-camp) था ! उसकी  हत्या से पूर्व उन्होंने रिवोल्वर का लाइसेंस लिया और एक रायफल शूटिंग रेंज में दाखिला लिया ! शूटिंग रेंज के मालिक ( HENRY STANTON MORLEY) की कोर्ट में दी गयी गवाही के अनुसार द्वारा वह निशानेबाजी में इतने पारंगत हो चुके थे की 18 फुट की दूरी से लक्ष्य पर 12 निशाने लगा लेते थे ! 
कर्जन वायली की हत्या ->
   1 -जुलाई-1909 को इंडियन नेशनल असोशिएशन (Indian National Association) के वार्षिकोत्सव में शामिल होने के लिए कई भारतीय और अंग्रेज इकट्ठे हुए ! जैसे ही अंग्रेज अधिकारी कर्जन वायली अपनी पत्नी के साथ आया वैसे ही मदन जी ने उसपर गोलियां चला दीं और पांच में से चार गोलियां सीधे उसके चेहरे पर लगीं ! इसी बीच जब पारसी डॉक्टर कावसजी लाल्काका ने वायली को बचाने की कोशिश की तो मदन जी ने उस पर भी दो गोलियां चला दीं ! परन्तु मदन जी ने जब स्वयं पर गोली चलाने का प्रयास किया तभी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया !

मुकदमा ->
      मदन जी पर 23-जुलाई-1909 को ओल्ड बेली कोर्ट (Old Bailey Court) में मुकदमा चलाया गया ! कोर्ट में मदन जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा की "उन्हें कर्जन की हत्या का कोई अफ़सोस नहीं है क्योंकि उन्होंने ऐसा करके भारत को अमानवीय ब्रिटिश राज की गुलामी से मुक्त कराने में अपना योगदान दिया है ! जबकि कावसजी की हत्या करने का उनका कोई इरादा नहीं था !"
       उम्मीद के अनुसार उन्हें म्रत्यु दंड की सजा हुई !
 जब जज ने अपना फेसला सुनाया और मदन जी से पूछा की वह क्या कुछ कहना चाहते हैं तो मदनजी ने वीरतापूर्वक कहा " मैं अपने बचाव में कुछ नहीं कहना चाहता सिवाय इसके की मैंने जो किया ठीक किया  ! मेरा मानना है की किसी ब्रिटिश कोर्ट को मुझे पकड़ने , कैद करने या फांसी देने का अधिकार नहीं है इसीलिए ही मैंने अपने लिए बचाव का वकील नहीं लिया है ! "
     " मेरा मानना है की अगर जर्मन अंग्रेजों पर कब्ज़ा करलें तो अंग्रेजों का जर्मनों के खिलाफ युद्ध करना राष्ट्रभक्ति है तो अपने केस में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना और भी ज्यादा न्यायोचित और देशभक्तिपूर्ण है ! पिछले 50 सालों में अंग्रेजों ने 80 मिलियन  भारतीयों की हत्या की है और हर साल भारत से 100 ,000 ,000 पौंड धन लूटा है ! मैं अंग्रेजों को अपने देशभक्त देशवासियों को फांसी देने और निर्वासित करने के लिए भी जिम्मेदार मानता हूँ , जिन्होंने वही किया था जो यहाँ अंग्रेज अपने देश के लोगों को करने की सलाह देते हैं ! जिस तरह जर्मनों को इस देश (इंग्लॅण्ड ) पर कब्ज़ा करने का कोई अधिकार नहीं है उसी तरह अंग्रेजों को भी हमारे भारत पर कब्ज़ा करने का कोई हक़ नहीं है ! इस तरह हमारी ओर से यह पूरी तरह न्यायोचित है की हम उन अंग्रेजों को मारें जो हमारी पवित्र भूमि को अपवित्र कर रहे हैं ! मैं अंग्रेजों के इस भयानक पाखण्ड , तमाशे और मज़ाक पर आश्चर्यचकित हूँ ! यह स्वयं मानवता के दमन में चैम्पियन हैं ! ..."
     मदनजी को जज ने दोषी करार देते हुए पूछा  की क्या उन्हें कुछ कहना है की  उन्हें म्रत्युदंड क्यों न दिया जाये ? इस पर उन्होंने जवाब दिया ,
       " मैं आपको बार-बार कह चुका हूँ की मैं इस कोर्ट को मान्यता नहीं देता ! आप जो चाहें कर सकते हैं मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता ! आज तुम गोरे लोग सर्व-शक्तिशाली हो लेकिन याद रखो कभी हमारा भी वक्त आयेगा ,तब हम जो चाहेंगे वो करेंगे ! "
    जब जज ने उन्हें म्रत्युदंड दिया तो उन्होंने वीरता से कहा ," धन्यवाद , माय लोर्ड !मुझे गर्व है की मुझे अपने देश के लिए अपने प्राण देने का सौभाग्य  मिला है !"

म्रत्युदंड ->
    17-अगस्त-1909 को उन्हें फांसी हो गयी !  फांसी के तख्ते पर इस वीर सिंह ने गर्जना की ,
         " मेरा विश्वास है की विदेशी संगीनों से पराधीन किया गया राष्ट्र सदेव युद्ध की स्थिति में ही रहता है ! चूंकि निःशस्त्र जाति द्वारा खुला युद्ध करना असंभव है इसीलिए मैंने अकस्मात हमला किया ! मैंने पिस्तोल निकली और गोली चला दी ! मुझ जैसा निर्धन बेटा अपने खून के अलावा अपनी माँ को और क्या दे सकता है ? इसीलिए मैंने उसकी बलिवेदी पर अपना बलिदान कर दिया है ! आज भारतीयों को जो एकमात्र सबक सीखना है वह यह की किस तरह मरें और यह सिखाने का एक ही तरीका है - खुद  मरकर दिखाना ! मेरी भगवन से एक ही प्रार्थना है की मैं दोबारा उसी माँ की गोद में पैदा होऊं और , जब तक हमारा लक्ष्य पूरा न हो , उसी पावन लक्ष्य के लिए दोबारा मरूं ! वन्दे मातरम !"


प्रतिक्रिया ->
      अधिसंख्य ब्रिटिश अख़बारों और कुछ उदारवादी भारतीयों ने अपेक्षा के अनुरूप मदन जी के इस साहसी कार्य की आलोचना की ! द इंडियन सोशीयोलोजिस्ट (The Indian Sociologist ) ने जब अपने अगस्त अंक में छपे एक लेख में मदन जी के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित की तो उसके प्रिंटर गाय अल्द्रेड (Guy Aldred)  को बारह माह (12) के सश्रम कारावास की सजा हो गयी ! मदन जी के इस वीरतापूर्ण कार्य ने आयरिश लोगों को भी प्रेरित किया जो की उस समय स्वयं अपनी लढाई  लढ़ रहे थे !
      कुछ आधुनिक इतिहासकारों का मानना है की मदन जी का मुकदमा पूरी तरह से  अन्यायपूर्ण और पक्षपातपूर्ण था क्योंकि न तो उन्हें बचाव के लिए वकील दिया गया ( यद्यपि यह उनकी ही इच्छा  थी क्योंकि उनका मानना था की किसी ब्रिटिश कोर्ट को उनपर मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं है ! ) और पूरा केस एक ही दिन में ख़त्म कर दिया गया ! कुछ कानून विशेषज्ञों के अनुसार फांसी के समय और स्थान का निर्धारण करना कोर्ट का काम नहीं है परन्तु कोर्ट ने ऐसा किया ! 

गांधीजी की नकारात्मक प्रतिक्रिया ->
    दुर्भाग्य से गांधीजी ने भी मदन जी के इस साहसी कार्य की आलोचना की ,
   " कर्जन वायली की हत्या के समर्थन में यह कहा जाता है की अगर जर्मनी इंग्लैंड पर हमला करता तो अंग्रेज हर जर्मन की हत्या करते इसी तरह यह भी हर भारतीय का अधिकार है की वो किसी भी अंग्रेज को मारे ...यह तुलना भ्रमजनक है ! अगर जर्मनी इंग्लैंड पर हमला करता तो अंग्रेज हर जर्मन की हत्या नहीं करते वह सिर्फ उन्ही जर्मनों को मारते जो हमलावर हैं न की उन्हें जो की असंदिग्ध हैं या अतिथि हैं ! "

यादगार ->
   मदनजी के पार्थिव शरीर को अंग्रेजों ने दफ़न करा दिया और हिन्दू रीति-रिवाज से उनका अंतिम संस्कार भी नहीं हो सका था क्योंकि उनका परिवार पहले ही उनका परित्याग कर चुका था और वीर सावरकर को मांगने पर भी उनका शव  नहीं दिया गया ! जब अधिकारी शहीद उधम सिंह  का शव  ढूंढ रहे थे तभी उन्हें संयोग से मदन जी का शव मिल गया और 13-दिसंबर-1976 को उसे भारत को सौंप दिया गया !    भगत सिंह और चन्द्र शेखर आजाद जैसे महान क्रांतिकारियों के लिए वह प्रेरणा के प्रमुख स्त्रोत थे और आज पूरे भारत में उनका नाम सम्मान से लिया जाता है पर अफ़सोस की बात है की भारत सरकार ने उनकी शहादत को संजोने के लिए कुछ नहीं किया है !

 स्रोत ->
(1) कोर्ट में जज के साथ हुई मदन लाल जी की बातचीत का स्रोत -> The Proceedings of the Old Bailey, 1674-1913  -A fully searchable edition of the largest body of texts detailing the lives of non-elite people ever published, containing 197,745 criminal trials held at London's central criminal court. link->
  http://www.oldbaileyonline.org/browse.jsp?id=t19090719-55&div=t19090719-55&terms=Dhingra#highlight

(2) http://www.hindujagruti.org/news/6729.html

(3)  http://en.wikipedia.org/wiki/Madan_Lal_Dhingra
(4) http://www.thaindian.com/newsportal/politics/madan-lal-dhingra-a-forgotten-martyr-comment_100231783.html


 

13.2.11

स्वतंत्रता सेनानी : लोकनाथ बल

श्री लोकनाथ बल भी हमारे उन गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों में से हैं ! वह मास्टर सूर्यसेन के सशस्त्र प्रतिरोधी बल के सदस्य थे और उसके बाद वह भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस से जुड़ गए ! स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वह कलकत्ता कोर्पोरेशन में प्रशासनिक अधिकारी बन गए और म्रत्युपर्यंत उस पद पर रहे !
   
प्रारंभिक जीवन और स्वाधीनता आन्दोलन ->
  श्री लोकनाथ बल का जन्म बंगाल ( आज का बंगलादेश ) के चटगॉंव जिले के धोल्रा गॉंव में 8-मार्च-1908 को हुआ था ! उनके पिता श्री प्राणकृष्ण बल थे ! अंग्रेजों के अत्याचारों से भारतीय युवा मन बेचेन हो उठा था ! इस समय में मास्टर सूर्य सेन ने क्रांति का बीड़ा उठा रखा था ! वह जानते थे की धन व हथियारों की कमी के कारण वह अंग्रेजों से सीधे नहीं लड़ सकते इसीलिए उन्होंने साम्राज्यवादी सरकार के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध शुरू किया ! श्री लोकनाथ बल भी उनके साथ जुड़ गए !
   18-अप्रैल-1930 को जब मास्टर सूर्य सेन ने प्रसिद्ध चटगॉंव शस्त्रागार पर हमला किया तब  श्री लोकनाथ बल भी उनके दल के प्रमुख सदस्य थे ! 22-अप्रैल-1930 को उनकी दोबारा ब्रिटिश सेना और ब्रिटिश पुलिस से  मुठभेड़ हुई ! इस गोलीबारी में श्री लोकनाथ जी के छोटे भाई श्री हरिगोपाल बल (तेग्र ) के साथ-साथ 11 क्रांतिकारी शहीद हो गए ! श्री लोकनाथ जी किसी तरह बचकर निकले और फ़्रांसिसी क्षेत्र  चंद्रनगर पहुँच गए ! लेकिन दुर्भाग्य से 1-सितम्बर-1930 को अंग्रेज पुलिस से हुई मुठभेड़ में उनके साथी श्री जीवन घोषाल शहीद हो गए और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया ! उन पर केस चला और 1-मार्च-1932 को उन्हें आजीवन  देश निकले (कालापानी) की सजा दी गयी और उन्हें अंदमान-निकोबार की सेल्युलर जेल में भेज दिया गया ! 1946 में वहां से रिहा होने के बाद वह पहले श्री एम्.एन.राय की रेडिकल डेमोक्रटिक पार्टी से जुड़े और बाद में वह भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में शामिल हो गए !

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ->
     श्री लोकनाथ बल 1-मई-1952 से लेकर 19-जुलाई-1962 तक कलकत्ता कोर्पोरेशन के द्वितीय डिप्टी कमिश्नर के पद पर रहे और 20-जुलाई-1962 को इसके प्रथम डिप्टी कमिश्नर  बन गए ! इसी पद पर रहते हुए 4-सितम्बर-1964 को कलकत्ता में उनका देहावसान हो गया ! 

6.2.11

युवा क्रांतिकारी : बसंत कुमार बिस्वास

        युवा क्रांतिकारी व देशप्रेमी श्री बसंत कुमार बिस्वास बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारी संगठन " युगांतर " के सदस्य थे ! उन्होंने अपनी जान पर खेल कर वायसराय लोर्ड होर्डिंग पर बम फेंका था और इस के फलस्वरूप उन्होंने 20 वर्ष की अल्पायु में ही देश पर अपनी जान न्योछावर कर दी !

5.2.11

महान स्वतंत्रता सेनानी : श्री पुल्लिन बिहारी दास


      श्री पुल्लिन बिहारी दास महान स्वतंत्रता प्रेमी व क्रांतिकारी थे ! उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए " ढाका अनुशीलन समिति " नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की व अनेक क्रांतिकारी घटनाओं को अंजाम दिया !

प्रारंभिक जीवन ->
      श्री पुल्लिन जी का जन्म 24 -जनवरी-1877 को बंगाल के फरीदपुर जिले में लोनसिंह नामक गाँव में एक मध्यम-वर्गीय

3.2.11

स्वतंत्रता सेनानी श्री बारीन्द्रनाथ घोष

      श्री बरिन्द्र्नाथ घोष महान स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार थे तथा "युगांतर" के संस्थापकों में से एक थे  ! वह बारिन घोष नाम से भी लोकप्रिय हैं ! बंगाल में क्रांतिकारी विचारधारा को फेलाने का श्री श्री बारीन्द्र और भूपेन्द्र नाथ दत्त ( विवेकानंद जी के छोटे भाई ) को ही जाता है ! महान अध्यात्मवादी श्री अरविन्द उनके बड़े भाई थे ! 

प्रारंभिक जीवन ->
     श्री बरिन्द्र्नाथ घोष का जन्म 5 -जनवरी-1880 को लन्दन के पास क्रोयदन(croydon) नमक कसबे में हुआ था ! उनके पिता श्री कृष्नाधन घोष एक नामी चिकित्सक व  प्रतिष्ठित जिला सर्जन थे जबकि उनकी माता देवी स्वर्णलता प्रसिद्ध समाज सुधारक व विद्वान राजनारायण बासु की पुत्री थीं ! श्री